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‘सौरभ’ के लिए 

प्रिय सौरभ

पता नहीं तुम यह कविता
पढ़ोगे भी या नहीं,
क्योंकि मैं नहीं जानता
कि
जिस दुनिया में तुम गए हो
वहाँ कैसे लोग होते हैं,
क्या खाते-पीते हैं,
क्या काम करते हैं,
कैसी बातें करते हैं ?
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A
पर मुझे लगता है,
वहाँ के लोग जैसे भी होंगे,
यहाँ से तो अच्छे ही होंगे ।
अब तुम्हीं बताओ-
किसके हाथ नहीं कांपते,
एक बेबस – लाचार माँ की गोद उजाड़ते हुए ?
किसी बहिन की राखी के धागे को
तार – तार करते हुए ?
किसी होने वाली ‘दुल्हन’ के सपने को,
अपने पैरों तले रौंदते हुए ?
इंसान तो ऐसे संवेदनहीन नहीं होते ।
A
इंसान शायद नहीं थे वो,
निर्मम, कट्टर, हिंसक जानवर हों
लेकिन गलती पूरी उनकी भी नहीं ।
उन्होंने तो कहा था-
सुधर जाओ, हमारी बात मान लो
वर्ना भुगतोगे ।
लेकिन ना… तुम तो ठहरे सिद्धान्तवादी,
बचपन से पढ़ा था –
‘ऑनेस्टी इज़ द बेस्ट पॉलिसी’ ।
लेकिन यह क्यों नहीं समझ पाये तुम
कि वह बचपन था,
और तुम अब 31 साल के ।
इतने सालों में इतना बदला है,
कि अब तो वो बचपन में पढ़ाने वाले शिक्षक भी,
इसे कहावत से अधिक मज़ाक समझते हैं ।
लेकिन तुम…..?
A
ख़ैर अब इन बातों  क्या फायदा,
जब तुम ही चले गए  ।
लेकिन तुमसे कुछ पूछना था –
उस दुनिया में भी सरकार है क्या ?
‘पुलिस-प्रशासन’ यहाँ की तरह ?
ना ही हो तो अच्छा है ।
सब मज़ाक है,
आहत भावनाओं से खेलने का ।
शायद तुम्हें मालूम हो,
यही पुलिस जिसका फ़र्ज़ है इन्साफ दिलाना,
आज सबूत मिटाने पर तुली है ।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाये,
तो कोई कहाँ जाए ?
इसलिए कहता हूँ मैं,
जो भी वो दुनिया होगी,
यहाँ से तो अच्छी ही होगी ।
A
अब कुछ इस दुनिया के बारे में तुम्हे बता दूँ
क्या हुआ है तुम्हारे जाने के बाद से ।
तुम्हारी माँ सदमे से लगातार बेहोश हो रही है,
बहनों का रो – रो के बुरा हाल है,
चूल्हा नहीं जला घर पर उस रोज से ।
तुम्हारी शादी के लिए जो लड़की देखी थी,
बहुत हंसने-खिलखिलाने वाली,
वह जड़ हो गयी है एकदम  से ।
पिता और भाई किसी तरह अपने आंसू छिपाकर,
तुम्हारे ‘शरीर’ को इन्साफ दिलाने को जूझ रहे हैं ।
A
हम सब जो तुम्हारे साथ पढ़े थे, खेले थे
आगे-पीछे,
एकजुट खड़े हैं आज,
‘जस्टिस फ़ॉर सौरभ’ के लिए,
इस ‘पॉवरफुल करप्ट सिस्टम’ से जूझने के लिए ।
इस विश्वास के साथ,
कि बदल पायेगा,
यह आक्रोश एक आंदोलन में ।
तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं,
बल्कि एक प्रेरणा है,
अवसर है तमाम सोये लोगों को जागने का,
जो रोज शिकार होते हैं इस ‘सिस्टम’ का ।
भगवान जाने क्या होगा, कैसे होगा
तुम शायद अब देख पाते होगे भविष्य ।
पर विश्वास मानो,
कल जो कुछ भी बेहतर हो पाता है,
इस देश में, इस समाज में,
उसका एक बड़ा कारण तुम भी होगे ।
A
अंत में,
एक बात कहनी थी –
तुम कॉलेज में मेरे बाद आये थे,
आज उस दुनिया में मुझसे पहले पहुँच गए हो,
सारे ‘रूल्स’ पता करके रखना,
ताकि कोई दिक्कत ना हो हमें बाद में  ।
बड़ा प्यार था यहाँ सीनियर-जूनियर में,
वहाँ भी रहेगा-
जब कभी भी हम मिलें ।
A
–   राजेश
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लक्षण

जब इन्द्रियां समझने लगे –
क़दमों की आहट
धड़कनों का स्वर
साँसों की खुशबू
आँखों के ख्वाब |

जब आँखें बोलने लगें,
होंठ सुनने लगे
मन देखने लगे
और ह्रदय थिरकने लगे |

जब भेद  मिट जाए –
तम और प्रकाश का,
स्वप्न और आभास का,
गूँज और खामोशी का,
संयम और मदहोशी का ।

जब आप उदास लिखने बैठे हों,
हाथ में लेखनी पकड़कर,
और आप ही मुस्कुरा दें
अपनी ही पंक्तियाँ  पढ़कर ।

जब थके ना कभी ये तन,
और अकारण हँसता रहे मन,
तब शायद वक़्त है
यह स्वीकार करने का
कि कोई घुस चुका है,
बहुत-बहुत  भीतर,
चेतन – अचेतन मन से परे ।
 

बोंगिया

मुझे उसका नाम पता नहीं,
ये भी नहीं पता
कि क्या उसका कभी कोई नाम था,
जब से होश संभाला,
सबके मुंह से ‘बोंगिया’ ही सुना उसका नाम ।
वैसे भी तो नाम उनके होते हैं,
जो स्कूल जाते हैं ।
नौकरी मिले ना मिले,
एक अच्छा नाम तो मिल ही जाता है ।
बोंगिया इतनी खुशकिस्मत नहीं थी ।

जब वह पैदा हुई थी,
तो उसकी माँ काम करती थी
हमारे यहाँ ।
झाड़ू – पोछा लगाना
बरतन साफ़ करना
कपडे-लत्ते धोना ।
एक दिन नहीं आती तो ऐसा लगता
काम का पहाड़ आ गया है माँ पर ।

जब बोंगिया हुई थी,
सबसे कठिन समय था वो
पूरे पांच महीने काम पर नहीं आई थी
उसकी माँ काम पर ।
उसके बाद आने लगी
बोंगिया को साथ लेकर ।
उसकी माँ साफ़ करती रहती हमारे कपडे
और ये लगी रहती,
बेफिक्र
अपने कपडे मैले करने में ।

बोंगिया सुन्दर थी,
एकदम तीखे नाक – नक्श से ।
और जैसे-२ बड़ी हो रही थी,
और चेहरा खिलता जा रहा था,
बस एक ही चिंता थी ।
दो साल हो गए,
बोंगिया बोली नहीं
एक शब्द भी ।
कभी – कभी मेरी माँ बैठ जाती उसके सामने
और बार -२ बोलती,
“बोलो माँ”
“बोलो पापा”
“बोलो दादा”
बोंगिया बोली नहीं एक शब्द भी कभी ।
और तब से उसका नाम ही पड़ गया-
‘बोंगिया’* ।

——————————————
शहर बदलते रहे,
बदली के कारण
कोई नहीं रहता था अब गांव में,
सब इधर उधर
और मैं बाहर
पढ़ाई के चक्कर में ।
पापा के रिटायरमेंट के बाद,
अब सब वापस आ गए फिर,
सिर्फ मुझे छोड़कर ।

बहुत अरसे बाद घर जाना हुआ अभी,
बड़ा घर बन गया था
वो भी शहर में ।
सुबह देर से उठा,
देखा बाई झाड़ू लगा रही थी
माँ समझा रही थी इशारे से,
कभी-कभी बोलकर भी,
सब समझ रही थी वो ।

माँ ने फिर कहा मुझसे –
“याद है न
वही बोंगिया है
जो आती थी हमारे गाँव वाले घर में ।
शादी करा दी गयी थी इसकी
गांव में ही
एक गूंगे लड़के से,
लेकिन बहुत पीता था वो
फिर कुछ बीमारी हुई
मर गया अभी कुछ दिनों पहले ।
तब से इधर ही आ गयी है,
हमारे घर पर काम करती है ।
खाना यहीं खाती है,
पैसे भी जमा कर देते हैं उसके नाम से ”

फिर माँ ने बोंगिया की और देखा,
और चिल्ला कर बोली –
“याद है ?
मेरा छोटा वाला बेटा?”
सुना है जो जन्मजात गूंगे होते हैं,
उन्हें सुनाई भी नहीं देता ।
पर शायद सब समझ में आ रहा था बोंगिया को,
उसकी आँखें चमक उठी थी ।
माँ ने फिर पूछा
‘याद है न ?”
उसने हाँ में सिर हिलाया,
फिर कुछ बोलना भी चाह रही थी,
पर आवाज़ नहीं निकल पाई ।
फिर वापस लग गयी वो अपने काम में ।

मैं सोच रहा था यूँ ही बैठे – बैठे,
बिस्तर पर ही,
कोशिश कर रहा था
समझने की
ज़िन्दगी को ।
क्या सोचती होगी बोंगिया ?
उसका पति मर गया था,
किसी बच्चे के पैदा होने से पहले ही ।
वो खुश है या दुखी है,
इस सत्य से,
कि उसके आगे कोई ‘बोंगिया’ नहीं है ?

*हमारी बोलचाल की भाषा में गूंगी लड़की को बोंगिया कहा जाता है ।

– राजेश रंजन

 

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जोगी

दिन भर लड़ता हूँ अपनी शख्सियत से,
रात होते ही भूल जाता हूँ अपना ही चेहरा ।
सपनों में मिला था जो शख्स तुझे, वो मैं नहीं था,
मैं तो खड़ा था बाहर, डाले सपनों पे सख्त पहरा ॥
तुम कोसते थे ना अक्सर मुझे उन छोटी मुलाक़ातों में,
ना रात तेरे संग अच्छी, ना है दिन सुनहरा ॥
तुम जहाँ ले रहे थे, अग्नि के गिर्द फेरे,
मैं भी बैठा था वहां, पहन जोगी के सेहरा ॥
सचमुच की है मैंने, अल्लाह की इतनी इबादत,
सुन अजान सुबह-शाम, हो गया खुदा भी बहरा ।

– ‘आर्य’

 

सखी के नाम खत

सखी,

पता नहीं तुम्हे किस नाम से बुलाऊँ
नाम तो उनके होते हैं,
जो दिखते हैं शरीर से |
तुम्हे कभी देख नहीं पाई
बस महसूस भर किया है |

बहुत दिनों से तुम्हें लिख नहीं पायी
समय ही नहीं मिला
ज़िन्दगी की भाग – दौड़
घर-बाहर, दोस्त – मुहीम |
और आज लिख रही हूँ
तो बहुत आहत हूँ, दुखी हूँ |                                    sh1

तुम भी क्या सोचती होगी,
जब भी बात करूँ,
तो सिर्फ रोना – रोना ।
पर तुम कैसे समझोगी,
तुम सुखी हो, मस्त हो
क्योंकि तुम्हारे पास शरीर नहीं ।
यहाँ तो सब खेल शरीर का ही है
शरीर – स्त्री या पुरुष ?
और इतनी सी बात तय कर देती है
कि किसके भाग्य में कितने आँसू हैं ।

तुम सड़क पर हो,
या फिर घर में
बाज़ार में हो
या फिर ऑफिस में
भीड़ – भाड़ में हो
या अकेले में
तुम्हे ध्यान रखना होता है
कि तुम्हारा शरीर ‘स्त्री’ का है |
फिर पल भर के लिए
भूल भी जाओ
तो चार घूरती नज़रें तुम्हे याद दिला देती हैं ।

विश्वास करो,
ये चार घूरती नज़रें मुझे हर जगह मिली हैं,
और उनके पीछे का चेहरा,
कभी कुत्ते, कभी सूअर
तो कभी भेड़िये के जैसा दिखा है ।
हर बार भागी हूँ,
उनसे बचकर
सरपट, एक साँस में सब कुछ छोड़कर…..|sh2
लेकिन शरीर की भी अपनी सीमा है,
तुम भागो
और तुम्हारे पीछे ४ कुत्ते भागने लगें
तो तुम कब तक बच पाओगी
शिकार के लिए बैठे ये कुत्ते
कभी – न – कभी तो तुम्हे दबोचने की कोशिश करेंगे ही ।
और फिर जो ज़ख़्मी होगा,
वो सिर्फ शरीर नहीं,
मन, आत्मा, जिजीविषा– सब कुछ ।

इन सबसे बचकर भी,
यदि कुछ आत्मविश्वास शेष रह गया
तो वो तुम्हारे आस-पास वाले तोड़ देंगे |
लोग तरह -२ की बातें कहेंगे
कोई तुम्हारे पावों को दोष देगा,
जो कुत्तों से बचकर तेज भाग नहीं पाये |
कोई तुम्हारे चेहरे को,
जो कुत्तों से छिप नही पाये ।
कोई किसे – कोई किसे
मैं तुम्हे लिख भी नहीं सकती ।
जो तुम्हारे विरोधी होंगे,
वो तुम्हे कुल्टा, चरित्रहीन आदि विशेषणों से सुसज्जित करेंगे
और जो तुम्हारे सबसे हितैषी होंगे –
वो तुम्हे चुप रहने को कहेंगे ।

यही सच है,
मानो या ना मानो ।
फिर बताओ किसे कहूँ,
इसलिए तुम्हे बता रही हूँ ।
मन की पीड़ा,
सिर्फ मन ही समझता है
और फिर तुम तो मेरी आत्मा हो ।

तुम कहोगी,
क्या मैं भी इस ई – मेल ज़माने में
खत लिख रही हूँ,
पर मुझे पता नहीं
वो कीबोर्ड की खिट-खिट में,
मेरी बात तुम तक पहुँचेगी या नहीं ।
ये आंसूओं की स्याही से,
खत लिखने वाला नुस्खा पुराना है,
मुझे पता है,
तुम पढ़ती हो,
क्योंकि मुझे बड़ा शकुन मिलता है ।

चलो खत लम्बा हो गया ,
अपना ख्याल रखना
और कभी जो मुलाकात हो,
परमात्मा से
तो बताना उनको
कि उनकी इस दुनिया में बड़ा अन्याय है ।
उनसे कहना
या तो वो सभी को बराबर का हक दें
या फिर ये अलग – अलग शरीर,
अलग-अलग चेहरे बनाकर
वाहवाही लूटना बंद कर दें |

फिर लिखूँगी तुझे,
प्रार्थना करना
अगली बार कुछ अच्छा सुनाने को हो |

– तुम्हारा स्त्री शरीर

 

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एक दिन की डायरी

कान में ट्रिंग-ट्रिंग की आवाज़ हुई diary copy

मैंने बाएं हाथ से ही
उसे ‘साइलेंट’ कर दिया
बिस्तर पर ही हूँ
लेकिन उठना तो है 5 मिनट में
कोई चाय लेकर क्यों नहीं आता
बिस्तर तक ।
————————-
बाहर निकला हूँ कमरे से
रातभर वारिश हुई है शायद
सारे कपडे भींगे पड़े हैं
कुछ तो निचे भी गिर गए हैं
फिर से धोना होगा 
क्यों इतना आलसी हूँ मैं 
4 दिन से पड़े थे 
फिर क्यों नहीं उठाया । 
अब क्या पहनूंगा मैं
उफ़ अंडरवियर-बनियान भी सूखे हैं कि नहीं
कुछ भी ठीक से नहीं रखता मैं
——————–
 
तैयार हो गया हूँ मैं
शर्ट का बीच का 1 बटन टूटा हुआ है,
सो एकदम सीधा होकर बैठना पड़ेगा ।
बेल्ट कहाँ खो गया कमरे में 
नहीं मिला,
सो पेंट सरक रही है थोड़ी
लेकिन मैं सम्भाल लूंगा ।
जैसे -तैसे भाग-भाग के कैंटीन पहुंचा हूँ
आखिरी इडली पर कब्ज़ा जमा लिया है मैंने
बहुत खुश हूँ भीतर से 
जैसे जंग फ़तेह कर आया हूँ ।
——————–
‘गाइड’ ने बुलाया है
कुछ समझ में नहीं आ रहा 
क्या बताऊँ ?
प्रॉब्लम वहीं पर अटका पड़ा है 
पिछले 15 दिनों से,
अब तो लग रहा है दिमाग भी काम नहीं कर रहा 
गदहा बनता जा रहा हूँ मैं 
दिन – प्रतिदिन । 
कैसे टॉप करता था मैं 
स्कूल में,
हर क्लास में ?
——————–
लंच टेबल पे बैठा हूँ मैं,
रंग-बिरंगे चेहरे हैं चारों तरफ,
सभी बातों में ब्यस्त हैं,
मछली बाज़ार बना हुआ है ।
खाने में क्या है ?
गाजर की सब्ज़ी ।
मुझे बिलकुल पसंद नहीं
गाज़र की भी कहीं सब्ज़ी बनती है?
कितना चिल्लाता मैं घर पे होता तो,
यहाँ किसके चिल्लाऊँ 
सो चुपचाप गटक लेता हूँ 
आँखें मूंदकर ।
———————
शाम हो गयी है,
बहुत खेलने का मन है,
लेकिन काम भी बहुत है,
देखते हैं समय निकल पाता है तो ।
एक-दो फ़ोन आते हैं
पापा के, माँ के, दोस्तों के
और देखते -२ शाम निकल जाती है ।
——————–
बहुत भूख लगी है
लेकिन मेस का डिनर खाने को
बिलकुल मन नहीं हो रहा ।
आखिरी समय तक इंतज़ार करता हूँ,
फिर दौड़ पड़ता हूँ 
मेस की ओर
एक और जंग फ़तेह करने को ।
———————
रोज की तरह डिनर टेबल पर गप्प जारी है
यैरा ने बाल छोटे करवा लिया
गैरा ने चश्मे का फ्रेम बदल लिया
नत्थू ने आज झकास कपडे पहने थे,
खैरा का नया पेपर आने वाला है क्या ?
ये फलाना-ढिमका हमेशा साथ-साथ दिखते हैं,
इनके बीच क्या चल रहा है ?
गप्प धीरे-धीरे चर्चा में बदलती है
मेस में रोज आलू क्यों होता है ?
उसके गाइड इतने खडूस क्यों हैं ?
तुम्हे ‘मैटलैब’ आता है क्या ?
ये आई आर सी टी सी इतना स्लो क्यों है ?
हमारी स्कालरशिप कब बढ़ेगी ?
चर्चा अब बहस में तब्दील हो गयी है
मोदी, राहुल या केजरीवाल
कैपिटलिज्म, कम्युनिज्म या सोशलिज्म
धोनी, कोहली या गम्भीर 
फेडरर, नडाल या जोकर
विंडोज, लिनक्स या मैकिंटोश
एप्पल, लेनोवो या डेल
एक्सपेरिमेंट, सिमुलेशन या थ्योरी
लव मैरिज या एरेंज मैरिज
गॉड या नो गॉड ।
बहुत देर बहस चलती है,
रोज की बात है ये ।
कोई जीतता, कोई हारता नहीं
हालांकि सभी को यही लगता है
कि उनका पॉइंट स्ट्रॉंग था ।
सभी इंटेलेक्चुअल हैं यहाँ ।
————————-
बिस्तर पर पड़ा हूँ मैं
बहुत थक गया हूँ
हाथ में हिंदी का पुराना उपन्यास है,
यूट्यूब पर हिंदी के पुराने गाने चल रहे हैं,
सभी मेरी इस पसंद पर हँसते हैं ।
कुछ सीख नहीं पाया मैं,
नए ज़माने से,
बदल नहीं पाया समय के अनुसार ।
वही पुरानी सोच,
घिसे-पिटे सिद्धांत ।
लैपटॉप की ओर देखता हूँ मैं,
मेरा पसंदीदा गाना प्लेलिस्ट के अंत में है –
“कहीं दूर जब दिन ढल जाए”
उम्मीद है तब तक नींद आ जायेगी ।
– राजेश आर्य
 

झुरमुट

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‘नंदिनी’

याद है तुम्हे ?

 वो झुरमुट

घर के ठीक पिछवाड़े में

जहाँ तुम अक्सर छिप जाया करती थी

लुक्का-छिप्पी खेलते हुए

और मैं जब भी ‘चोर’ बनता था

तो सीधे चला जाता था

उसी झुरमुट के पास

और जाके पीछे से

तुम्हारे पीठ को थप थपाकर बोलता था

‘धप्पा ‘

और तुम्हारे चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती थी

पकडे जाने पर भी ।

मैं कभी भी नहीं समझ पाया,

उस मुस्कान का मतलब ।

तुमने भी तो कभी समझाया नहीं ।

लेकिन तुमने कभी भी अपने

छिपने का स्थान नहीं बदला ।

हर बार उसी जगह

उसी झुरमुट में

तुम पकड़ी गयी,

उसी मुस्कान के साथ ।

फिर एक दिन,

फिर पापा की बदली हो गयी ।

मैं जा रहा था

और तुम मुझे छिप कर देख रही थी,

उसी झुरमुट से

लेकिन आज कोई मुस्कान नहीं थी ।

मुझे लगा-

दौड़ के जाऊं तुम्हारे पीछे

और बोलूं ‘धप्पा’,

ताकि तुम मुस्कुरा दो

लेकिन गाड़ी हॉर्न दे रही थी ।

मैं हाथ हिल रहा था

और तुम्हारी आँखों से मोती टपक रहे थे ।

______________________

12 साल कैसे बीत गए

पता ही नहीं चला

इस ‘मॉल’ वाले शहर में

बिना किसी झुरमुट के।

फिर एक दिन जब

छोटे बच्चों को आँगन में

लुका-छिप्पी खेलते देखा

तो लगा कि

शायद कुछ छूट गया है पीछे ।

और चल पड़ा यादों की पोटली लिए

उसी झुरमुट के पास

कि शायद तुम वहीँ पे छिपी हो,

अब भी

किसी धप्पे के इंतज़ार में ।

लेकिन पहुंचा तो देखा

कोई झुरमुट नहीं था वहां

थी तो एक १० मंजिला इमारत

और इमारत में बालकनी से झांकते

भींगे-सूखे कपडे,

बच्चों के निकर ।

कहाँ ढुंढता तुम्हे,

पर रास्ते में अर्जुन चाचा मिल गए ।

बूढ़े हो चले थे

लेकिन मूंछें अभी भी वैसी ही तनी ।

मुझे फटाक से पहचान गए ।

मैंने पूछा – “चचा! वो झुरमुट ?”

चाचा बोले – “क्यों तरक्की देखी नहीं गाँव की ?

अब तो ए सी है सबके घर में “

मैंने फिर पूछा थोडा सकुचाते हुए

“और चचा! वो नंदिनी ?’

चाचा थोडा मुस्कुराये और बोले –

“वो यही रहती है बेटा,

अपने पति के साथ ।

इसी इमारत में

6 ठा मंजिला,

फ्लैट नं 618 ।

तुम जाके मिल लो उससे,

उसे अच्छा लगेगा ।”

मैंने कुछ नहीं कहा,

थोडा कदम आगे बढाया,

फिर बुदबुदाया

“6 ठा मंजिला,

फ्लैट नं 618″

और फिर वापस लौट गया

6 ठी मंजिल

बहुत ऊंची होती है शायद ।

______________________

बाहर सोसायटी के बगान में

कुछ झुरमुट उग आये थे,

फूलों के साथ ।

बस उन्हें साथ ले आया,

एक उपहार समझकर ।

– राजेश ‘आर्य’
वैलेंटाइन डे, 2014
 

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