पैरों के निशाँ
मिटते नहीं
इतनी जल्दी,
हाँ छिप जरुर जाते हैं
वक़्त के साथ,
निरंतर उड़ रही धूल से |
लेकिन,
जब भी आता है
कोई तेज हवा का झोंका,
अचानक, बिना बताये,
अपने साथ उड़ा ले जाता है
वो जमी हुई धूल की परत
और साफ़ दिखने वो निशाँ
जहाँ कभी
हमारे कदम पड़े थे |
साथ ही,
सुनाई देने लगती है
वो सभी बातें
जो हमने कही थी
एक – दूसरे से
उस वक़्त,
जाने – अनजाने |
दिखाई देने लगता
वो सब कुछ
ठीक वैसे ही |
वही छायादार पेड़,
वही सुनसान सड़क,
और वही तुम्हारा
हँसता – खिलखिलाता हुआ चेहरा |
पर जाने किस सच का भय है मुझे
इन साफ़ गहरे निशाँ से
कि आँखें मूँद लेता हूँ मैं,
हर ऐसे तेज हवा के झोंके पर ?
और लौट जाता हूँ
उसी सच पर
जिसे मैं जानता हूँ |
कि हम खड़े थे
इस मोड़ पर
इस पेड़ के नीचे
कुछ पल |
कुछ पल ??
नहीं – नहीं
केवल कुछ पल नहीं,
शायद सबसे कीमती लम्हा
ज़िन्दगी का |
आँखें मूंदे-२ ही
दिख जाते हैं मुझे
वो पदचिन्ह
चार पैर और बीस अंगुलियाँ
हाँ यहीं हम खड़े थे
साथ – साथ |
फिर सोचता हूँ
अक्सर अकेले
कि हम कभी हमराही थे |
कोसता हूँ
हर पल
अपने-आप को,
कि क्यों नहीं चल पाया
उसके साथ
चार कदम भी
उस मोड़ से चलने के बाद |
आज अरसे बाद आये
अचानक उस झोंके के बाद
बंद नहीं कर पाया मैं
अपनी आँखें
एकदम से
और मजबूरन दिखने लगे मुझे
वो गहरे निशाँ
साफ़-साफ़
नंगी आँखों के सामने |
लेकिन ये क्या ??
नहीं – नहीं
ये निशाँ ऐसे क्यों हैं ?
क्यों मैंने इसे कभी देखा नहीं ?
दोनों जोड़ियाँ पैर,
साथ- साथ
बहुत गहरे, बिलकुल स्पष्ट
लेकिन,
बिल्कुल उल्टी दिशाओं में |
एक मेरे सपनों की ओर
और,
एक ठीक उसके विपरीत |
मूरख मैं
जाने कब समझूंगा
इस सच को
कि किसी रास्ते पर
साथ-२ पड़े निशाँ -
चार पैर और बीस अंगुलियाँ
सदा ही ‘हमराही’ के नहीं होते
भले ही वो निशाँ
कितने ही गहरे क्यों न हों |
~ राजेश ‘आर्य’














Sandeep jaiswal
फ़रवरी 14, 2012 at 5:56 पूर्वाह्न
Very nice…..aapne vastaviktao ko sabdo me bahut achche trah se ukera h….